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चौरीचौरा कांड : ऐतिहासिक परिदृश्य में

Oct 9, 2013 pm31 18:02pm

चौरीचौरा कांड : ऐतिहासिक परिदृश्य में 

स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान सम्पूर्ण भारत असंतोष की ज्वाला में जल रहा था। यह असंतोष अकारण उत्पन्न नहीं हुआ था। रोलेट ऐक्ट, जलियांवाला बाग काण्ड और पंजाब में मार्शल कानून लागू कर दिये जाने की घटनाओं ने प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान अंग्रेजों द्वारा भारत के प्रति दिखाई जाने वाली उदारता और युद्धकालीन लुभावने वायदों की पोल खोल कर रख दी थी। 1919 में माण्टेग्यू-चेम्सफोर्ड द्वारा घोषित सुधारों से लोग संतुष्ट नहीं थे। पंजाब में विद्रोहात्मक गतिविधियों की जांच करने के लिए गठित हंटर कमेटी की रिपोर्ट ने मात्र लीपापोती का कार्य ही किया था। जब देशवासियों को यह पता लगा कि जलियांवाला बाग के क्रूर नायक जनरल डायर की कार्यवाहियों को ब्रिटेन के हाउस ऑफ लार्डस का समर्थन प्राप्त हो गया है और जनरल डायर की सहायता के लिए 30,000 पौण्ड की धनराशि ब्रिटेन के निवासियों द्वारा स्वेच्छा से दान स्वरूप एकत्र की गई है तो ब्रितानी हुकुमत की न्यायप्रियता और उदारवाद से देशवासियों का मोह भंग हो गया।
मई 1920 में टर्की के साथ ब्रिटेन द्वारा की गई संधि से यह बात निर्विवाद रूप से प्रमाणित हो चुकी थी कि अंग्रेजों द्वारा मुसलमानों के साथ विश्वासघात किया गया है। वर्ष 1920 में खिलाफत कमेटी पे अपनी इलाहाबाद की सभा में सर्वसम्मति से असहयोग आंदोलन का प्रस्ताव स्वीकार किया गया और महात्मा गांधी से अनुरोध किया कि वे इस आंदोलन का नेतृत्व करें। गांधी जी ने 22 जून को भारत के वायसराय को पत्र लिखा। जिसमें उन्होंने कहा कि अनादिकाल से शासितों को शासकों के कुशासन से असहयोग का अधिकार प्राप्त है। दिसम्बर 1920 में कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में देशबंधु चितरंजन दास द्वारा असहयोग आंदोलन का मसविदा प्रस्तुत किया गया जिसे कांग्रेस द्वारा कार्यवाही के लिए स्वीकार कर लिया गया। कांग्रेस के इस असहयोग आंदोलन की रणनीति में मुख्य रूप से मानद उपाधियों और सम्मानों को वापस करना, सरकारी स्कूलों का बहिष्कार, न्यायालयों का बहिष्कार, विदेशी कपड़ों का बहिष्कार, शासकीय सेवाओं से त्यागपत्र और यथासंभव रूप से सिविल नाफरमानी जिसमें करों की अदायगी न करना भी सम्मिलित था। महात्मा गांधी ने अली बंधुओं के साथ मिलकर पूरे देश में सैकड़ों सभाओं में शिरकत की, आंदोलन के प्रथम माह में ही लगभग नब्बे हजार छात्रों ने राज्य पोषित स्कूलों और कालेजों को छोड़ दिया तथा राष्ट्रीय नायकों द्वारा स्थापित विद्यालयों में नाम लिखवा लिया। पंजाब भी लाला लाजपत राय के नेतृत्व में अग्रणी भूमिका में स्थापित हुआ। यह आंदोलन विशेष तौर पर देशबंधु चितरंजनदास और सुभाष चंद बोस की प्रेरणा से बंगाल में अभूतपूर्व सफलता दर्ज करा लिए। इसके अतिरिक्त बम्बई, उत्तर प्रदेश, बिहार और उड़ीसा में भी व्यापक जनसमर्थन प्राप्त हुआ। न्यायालयों के बहिष्कार के आह्वान पर देश के तमाम ख्यातिप्राप्त एवं लब्धप्रतिष्ठ न्यायाविद जैसे चितरंजन दास, मोती लाल नेहरू, सी. राजगोपालाचारी एवं किचलू आदि अपनी चलती हुई वकालत को छोड़कर आंदोलन में कूद पड़े। जिसने समस्त देशवासियों को त्याग का एक अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया। लेकिन संभवत: विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार सर्वाधिक सफल रहा। इन सभी उदाहरणों से यह स्पष्ट हो जाती है कि लोगों में असंतोष और नाफरमानी का भाव इस कदर भर चुका था कि जगह-जगह पर स्थानीय आंदोलन छेड़ दिये गये। जो कभी-कभी असहयोग आंदोलन के अनुरूप नहीं थे और कभी-कभी असहयोग की घोषणा अहिंसा की नीति से असहमत भी।
कांग्रेस द्वारा संचालित असहयोग आंदोलन जनपद में 1920 में ही अपनी जड़ें जमा चुका था और 8 जनवरी 1921 में महात्मा गांधी के आगमन तथा स्थानीय बाले के मैदान में उनके द्वारा सम्बोधित जनसभा ने स्थानीय कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा का संचार कर दिया था। व्यापक स्तर पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं जिन्हें राष्ट्रीय वालन्टियर कहा जाता था, की भर्ती का अभियान चलाया गया। देखते ही देखते अकेले गोरखपुर जनपद में 15000 वालन्टियरों की भर्ती की गई। इन वालन्टियरों द्वारा रात्रिकालीन गश्त प्रारम्भ की गई, ुनुक्कड़ सभाओं और जुलूसों का आयोजन दैनिक कार्यक्रमों का हिस्सा बन गये। शराब और ताड़ी की दुकानों पर धरना, प्रदर्शन, पिकेटिंग के कार्यक्रम पूरे जोशोखरोश के साथ आरंभ किये गये और बड़ी मात्रा में विदेशी कपड़ों की होली जलाई जाने लगी। हाथ की बुनी हुई खादी का प्रचलन बढ़ा और लोगों में गांधी टोपी की राष्ट्रीय परिधान के रूप मेंे मान्यता बढ़ी। ठीक इसी समय साम्राज्य के सलाहकारों ने प्रिंस ऑफ वेल्स की प्रस्तावित भारत यात्रा को अमलीजामा पहनाया। ऐसा करने के पीछे उनकी सोच थी कि भारतीय अपने आंदोलन से विमुख होकर प्रिंस के प्रति अपनी स्वामीभक्ति प्रदर्शित करने लग जायेंगे। परन्तु प्रिंस ऑफ वेल्स का स्वागत किया वीरान सड़कों और बंद बाजारों ने। यह यात्रा पूरी तौर पर विफल रही। क्योंकि असहयोग का संदेश और असंतोष दूरदराज के ग्रामीण इलाकों तक पहुंच चुका था। ऐसा ही एक छोटा-सा गांव चौरीचौरा समाचारों की सुर्खियों में आया। चौरीचौरा में यूरोपीय वस्त्रों का शायद ही कोई खरीददार होगा। परन्तु पास के ही मुण्डेरा बाजार में शांतिपूर्ण पिकेटिंग का कार्यक्रम पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार चल रहा था। 1 फरवरी, 1922 को चौरीचौरा थाने के बड़े दारोगा गुप्तेश्वर सिंह ने सदल बल वहां पहुंच कर वालन्टियरों की खुलेआम पिटाई प्रारंभ कर दी। इस घटना के प्रतिक्रियास्वरूप बड़ी तादात में वालन्टियर्स की सभा डुमरी में बुलाई गई। स्थानीय नेताओं ने इस सभा को संबोधित किया। इसके उपरांत यह जुलूस चौरीचौरा के लिए प्रस्थान किया। थाने पर पहुंच कर जुलूस रुका और जुलूस का नेतृत्व कर रहे लोगों ने बर्बरतापूर्ण आचरण के लिए थानाध्यक्ष का स्पष्टीकरण मांगा। कुछ शांतिप्रिय और प्रबुद्ध व्यक्तियों की मध्यस्थता के बाद जुलूस शांतिपूर्ण ढंग से आगे बढ़ गया। जुलूस थोड़ी दूर ही आगे बढ़ा था कि इसके पिछले हिस्से में भगदड़ मच गई और शोरशाराबा और क्रंदन के स्वर सुनाई पड़ने लगे। पुलिस कर्मियों द्वारा सत्याग्रहियों के साथ दु‌र्व्यवहार किया गया। जिसकी प्रतिक्रियास्वरूप भीड़ पीछे लौट पड़ी और पुलिसजनों पर पथराव करने लगी। जवाबी कार्यवाही के रूप में पुलिस ने गोलियां चलानी प्रारंभ कर दी। जिसके परिणामस्वरूप घटनास्थल पर ही 260 व्यक्तियों की मृत्यु हो गई। पुलिस की गोलियां तब रुकीं जब उनके सभी कारतूस समाप्त हो गए। वालन्टियर्स के धैर्य का बांध टूट चुका था। क्योंकि उनकी आंखों के सामने अपने साथियों के रक्तरंजित शव पड़े थे और अपने घायल साथियों के लहू-लुहान जिस्म दर्द से तड़प रहे थे। सत्याग्रहियों ने पुलिसजनों को थाने से बाहर निकलने के लिए ललकारा। पुलिसवाले भाग खड़े हुए और थाने के अन्दर घुसकर दरवाजा अंदर से बंद कर लिया। उग्र जुलूस ने थाने को आग लगा दी। फलस्वरूप अंदर मौजूद सभी 23 पुलिसकर्मी जल कर राख हो गये।
इसके बाद शुरू हुआ पुलिस का तांडव नृत्य। चौरीचौरा और आसपास के क्षेत्र में लोगों के मकान जलाये गये, लोगों के खेतों में आग लगा दी गई। चौरीचौरा काण्ड में कुल 232 व्यक्तियों के खिलाफ आरोप पत्र न्यायालय में प्रस्तुत किये गये। जिसमें से 226 मामलों को सेशन को सुपुर्द किया गया। दो सत्याग्रहियों की मुकदमें के दौरान मृत्यु हो गई। मुकदमें के ऐतिहासिक फैसले में 172 व्यक्तियों को सजा-ए-मौत सुनाई गई। जिन्हें हम आज देशभक्तों के रूप में याद करते हैं। उनका पुलिस अभिलेखों में आज भी बलवाइयों और दंगाइयों के रूप में उल्लेख है। सत्र न्यायालय के इस फैसले के विरुद्ध पंडित मदनमोहन मालवीय और पंडित मोती लाल नेहरू ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अपील दायर की और सत्याग्रहियों के पक्ष में जोरदार अपीलों और धारदार तर्को की झड़ी लगा दी। अपीलीय न्यायालय द्वारा 38 व्यक्तियों को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया गया, 14 व्यक्तियों की सजा को आजीवन कारावास में परिवर्तित कर दिया गया, 19 व्यक्तियों को मौत की सजा सुनाई गई, शेष वालन्टियर्स को तीन साल से लेकर आठ साल की सजायें दी गई। माननीय उच्च न्यायालय का यह ऐतिहासिक फैसला 30 अप्रैल, 1923 को न्यायमूर्ति ग्रीमवुड मीयर्स और टी.सी. पीगॉट की खण्डपीठ द्वारा सुनाया गया। 38 व्यक्तियों जिन्हें सेशन न्यायालय द्वारा मौत की सजा सुनाई गई थी, के बारे में यह कहा गया कि पत्रावली पर जो साक्ष्य हैं वह इन व्यक्तियों के विरुद्ध किसी भी आरोप को सिद्ध करने में नितांत असमर्थ हैं। बावजूद इसके पूरे विश्व में अपनी न्यायाप्रियता का परचम लहराने वाली ब्रिटिश हुकूमत के ये वफादार जज थे जो जलियांवाला बाग काण्ड में निहत्थी भीड़ पर सीने पर गोलियों की बौछार करने के आदेश देने वाले जनरल डायर को तो सम्मानित करती है परन्तु अपने देश की आजादी के लिए आंदोलन करने और अपने विरुद्ध की जा रही अन्यायपूर्ण कार्यवाही का प्रतिरोध करने वाले सेनानियों के लिए मृत्यु और केवल मृत्यु की सजा ही मुनासिब मानती है। वस्तुत: न्याय का यह दोहरा मापदण्ड अंग्रेजी हुकूमत की पहचान रही है।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में चौरीचौरा काण्ड एक धूमकेतु की तरह उदित होता है और अपने पीछे ढेर सारे प्रश्न छोड़ जाता है। जिसका उत्तर इतिहासकारों को खोजना होगा। महात्मा गांधी इस घटना से इतने दुखी थे कि उन्होंने अपना आंदोलन वापस ले लिया। 
चौरीचौरा काण्ड ने यह बात पूरी तरह से सिद्ध कर दी थी कि कांग्रेस माइक्रोस्कोपिक माइनारिटी नहीं रह गई है। बल्कि इसका संदेश सुदूर ग्रामों में रहने वाले किसान, मजदूर, हस्तशिल्पी, दुकानदार, व्यापारी और कर्मचारियों तक पहुंच चुका है। चौरीचौरा की घटना ने यह बात भी साबित कर दी थी कि गरीब, गूंगे और गँवार कहे जाने वाले भारतवासी राष्ट्रीय राजनीति में दीक्षित हो चुके हैं और उनमें साहस, बलिदान और दमन का प्रतिकार करने की अदम्य इच्छा शक्ति जागृत हो चुकी है।

-प्रगति अग्रहरि

(Courtesy : Dainik Jagran Gorakhpur)

 

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