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	<title>Anunaad : Our Online Magazine</title>
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		<title>. . . हैप्पी न्यू ईयर !!</title>
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		<pubDate>Fri, 30 Dec 2011 05:48:01 +0000</pubDate>
		<dc:creator>uday</dc:creator>
				<category><![CDATA[व्यंग]]></category>

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		<description><![CDATA[देश की मंहगाई से बेहाल देशवासियो को नये साल की बधाई। नये वेतन आयोग से खुशहाल सरकारी बाबुओं को हैप्पी न्यू  ईयर। आजकल सभी लोग न्यू ईयर के हैप्पी होने की कामना कर रहे हैं। पुराने साल में हैप्पी न्यू ईयर के बाद तो सब सैड सैड ही रहा। कभी  तेल के दाम ने बदहजमी [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>देश की मंहगाई से बेहाल देशवासियो को नये साल की बधाई। नये वेतन आयोग से खुशहाल सरकारी बाबुओं को हैप्पी न्यू  ईयर। आजकल सभी लोग न्यू ईयर के हैप्पी होने की कामना कर रहे हैं। पुराने साल में हैप्पी न्यू ईयर के बाद तो सब सैड सैड ही रहा। कभी  तेल के दाम ने बदहजमी की,  तो कभी गैस (के दामों) ने पेट खराब किया । कभी प्याज ने  आंखों में आंसू लाया, तो कभी आलू ने भुरता बनाया। कभी बच्चों की  बढती फ़ीस ने खीस निपोरी, तो कभी  तेल, दाल के दाम से  दिल में टीस उठी। मगर दिल बेचारा पिछले साल से लेकर इस  साल तक न्यू ईयर के हैप्पी को ढो रहा है।</p>
<p>हैप्पी न्यू ईयर उन लोगों के लिये, जो इस साल शेयर मार्केट में लुट गये हैं। बिना दिवाली ही दिवाला निकलवा चुके लोगों को हैप्पी न्यू ईयर। पूरे साल सैड रहे लोगों को हैप्पी न्यू ईयर। न्यू ईयर तो हैप्पी होने के लिये ही होता है। साल भर से एक ही हिरोइन के पुराने कैलेण्डर को बदलने के दिन आ गये हैं। इस कंपकंपाती सर्द में नई हिरोइनों के दिगम्बर धारी  नये कैलेण्डर लगाने का वक्त आ गया है, जिससे कि सर्दी में भी गर्मी का एहसास  मिले।</p>
<p>हैप्पी न्यू ईयर उन सभी लोगों को जो पूरे साल हैप्पी होने का वेट करते  रहे। ए राजा हों या कलमाड़ी, सभी को हैप्पी न्यू ईयर। सी एम इन वेटिंग के साथ साथ पी एम इन वेटिंग को भी हैप्पी न्यू ईयर। पी एम इन वेटिंग के लिये यह साल भले ही सैड रहा हो, सी एम इन वेटिंग  तो न्यू ईयर में हैप्पी हो ही सकते हैं। बाकी देश की जनता तो हमेशा हैप्पी इन वेटिंग ही रहती है, सरकार कोई भी हो, या साल कोई भी हो।</p>
<p>ठण्ड से मरने वाले गरीबों को खासतौर से हैप्पी न्यू ईयर। क्योंकि उनके लिये  स्वर्ग लोक पृथ्वी लोक से ज्यादा ही हैप्पी रहेगा। ग्रीटिंग कार्ड  के खर्चे और मोबाइल बिल से डरे हुये लोगों को  सैड के साथ हैप्पी न्यू ईयर। संसद  की मेज पर पटके हुये रिश्वत के करोडों रूपयों को, तरसती, ललचाती निगाहों से देखती  हुई भारतीय जनता को  हैप्पी न्यू ईयर। जनता के राज में राज ठाकरे से सहमी हुई जनता को हैप्पी न्यू ईयर। मंदी की मार से बेरोजगार हुये कर्मचारियों को भी हैप्पी न्यू ईयर।</p>
<p>शीला की लीला और शिवराज का राज कायम  रहने पर उन्हें हैप्पी न्यू ईयर। परमाणु करार पर साल भर चली तकरार के साथ साथ करार के लिये बेकरार कांग्रेसियों को हैप्पी न्यू ईयर। माया की छाया से निकले अजित सिंह को कांग्रेस के हाथ का साथ इस साल हैप्पी कर गया। पी एम आतंकवाद से बचने का सात साल से करते रहे उचित उपाय। हर बिस्फ़ोट और अटैक पर, बस मुंह से चिल्लाये। आर पार की लडाई का, जनता करती रह गई वेट। कई साल से पाकिस्तान को, मुंह से ही कर रहे हैं मटियामेट। सरकारी वादे और आतंकवादी इरादे के बीच पिसती जनता को हैप्पी न्यू ईयर।</p>
<p>बिहार  की बाढ से  प्रभावित सरकारी राहत -कर्मचारियों को हैप्पी न्यू ईयर। बाढ पीडितों के लिये हैप्पी न्यू ईयर की कोई गारण्टी नहीं है। कोसी के कहर से  प्रभावित, खाने के दाने दाने को पाने के लिये आपस में मर मिट जाने को बेताब, जनता को हैप्पी न्यू ईयर। ग्रीटिंग कार्ड बनाने वाली कम्पनियों की तो हर साल बल्ले बल्ले होती है। इस साल जूते चप्पल बनाने वाली कम्पनियों को खास तौर से हैप्पी न्यू ईयर। आखिर इस  साल से जूते पहनने की बजाय खाने  खिलाने के लिये जो इस्तेमाल होने लगे हैं। भला हो बुश महराज  का, जिन्होंने  सर पे जूते खाकर,  तुच्छ, निम्नकोटि  की  पैरों की चीज को सिर पर लेकर, जूता कम्पनियों को खुश कर दिया । आखिर यही एक सच्चे लोकतंत्र की पहचान है। कोई ऊंच नीच नहीं। बुश साहब एक दिन जनता का जूता खाकर लोकतन्त्र की सीख दे गये। इधर राहुल बाबा यूपी वालों को भीख दे गए। कांग्रेस के साठ साल पर माया का पाँच साल भारी हो गया। कांग्रेस राज में सब अंबानी थे, अब यूपी वाला भिखारी हो गया। वोट मांगने की अब नेताओं की बारी है। जनता ही बताएगी कि कौन भिखारी है। भारतीय जनता पचासों साल से नेताओं के थप्पड़ खा रही थी। इस साल से उसने भी थप्पड़ लगाना सीख लिया है। थप्पड़ खाने खिलाने वाले लोगों और नेताओं को भी हैपी न्यू ईयर।</p>
<p>हैप्पी न्यू ईयर पाकिस्तानी सपूत जरदारी साहब को भी, जिन्हें पाकिस्तान के पाकिस्तान में होने का भी सबूत चाहिये। हैप्पी न्यू ईयर ओबामा और बुश को भी, जो पाकिस्तानी कार्रवाई से खुश हो जाते हैं। अनहोनी को होनी कर देने वाले महेन्दर सिंह धोनी को भी हैप्पी न्यू ईयर। टाटा की नैनो को सिंगूर से दूर कर देने वाली ममता, जिनका विरोध कभी नहीं थमता, को हैप्पी न्यू ईयर। नये साल में बीबी से लेकर पड़ोसन तक, कुछ भी नया ना होने पर भी, नये साल की बधाई देने वाले हर शख्स को हैप्पी न्यू ईयर।</p>
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<p><strong>मनोज जाँनी</strong></p>
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		<title>खत्म हुई लड़ाई</title>
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		<pubDate>Fri, 30 Dec 2011 04:12:04 +0000</pubDate>
		<dc:creator>uday</dc:creator>
				<category><![CDATA[व्यंग]]></category>

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		<description><![CDATA[लो जी, एक लड़ाई खत्म हुई. बल्कि यूं कहिये कि पराजित हुई. जिस लड़ाई ने आम लोगों को आशा की नई किरण दिखाई. जिस लड़ाई के चलते कई प्रसिद्ध लोग अपयश को प्राप्त हुए और कई अनजान चेहरे अचानक राष्ट्रीय फलक पर ध्रुव तारे की तरह चमके. आखिरकार वही चमत्कारी सी दिखाई देने वाली लड़ाई [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h2>लो जी, एक लड़ाई खत्म हुई. बल्कि यूं कहिये कि पराजित हुई. जिस लड़ाई ने आम लोगों को आशा की नई किरण दिखाई. जिस लड़ाई के चलते कई प्रसिद्ध लोग अपयश को प्राप्त हुए और कई अनजान चेहरे अचानक राष्ट्रीय फलक पर ध्रुव तारे की तरह चमके. आखिरकार वही चमत्कारी सी दिखाई देने वाली लड़ाई खत्म हो गई. लड़ाई बेचारी भी क्या करे भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए भ्रष्टाचार से बनी पथरीली राहों पर आखिर कब तक चलती. कब तक दिग्गी राजा के तीर और सिब्बल चाचा की शमशीर सहती.थक गयी, टूट गयी बेचारी.<br />
अपुन तो पहले से ही ये राग अलाप रहे थे कि इतने शक्तिशाली  भ्रष्टाचार से पंगा मत लो. जिस भ्रष्टाचार के विराट चतुर्भुज रूप की चकाचौंध के आगे सब नतमस्तक हैं. सभी नर नारी, देव, किन्नर, नेता, अभिनेता, सीवीसी, कैग, आदि इसी भ्रष्टाचार में समाहित हैं. राशन की लाइन में भ्रष्टाचार,लाइसेंस की कतार में भ्रष्टाचार, खद्दर के ख में, भगवान् के भ में, और पुलिस के प में भ्रष्टाचार. सड़कों, गलियों, चप्पे-चप्पे और कण-कण में भ्रष्टाचार. यानि भ्रष्टाचार आदि है और भ्रष्टाचार ही अनन्त हैं. ऐसे में  चंद लोग इस भ्रष्टाचार से लड़कर क्या कर लेंगे जी.क्या औकात है जी इनकी..ये तो वही बात हुई जैसे राजपाल यादव को खली से लड़ने के लिए रिंग में उतार दिया जाए. वैसे भी भ्रष्टाचार और अपने देश का तो साथ बहुत पुराना है. बिलकुल मेड फॉर इच अदर वाला…हमारे दादा जी बताया करे हैं कि अपने यहाँ तो भ्रष्टाचार पुरातन काल से है. इसी भ्रष्टाचार के चलते द्रोण ने एकलव्य से रिश्वत में अगूंठा मांग लिया था. ऐसे एक नहीं बहुत से उदहारण हैं इतिहास में… असल में भ्रष्टाचार से अपुन के देश की पहचान है. जब भी विश्व में भ्रष्टाचारी देशों की चर्चा होती है तो अपने भारत का नाम ऊपर की लिस्ट में ही होता है. कितनी गौरवमयी बात है ये…ऐसे में भ्रष्टाचार के विरुद्ध जंग अप्रासंगिक है…लेकिन भाई अपुन की सुनता ही कौन है. और कोई सुने भी क्यूँ. जिस तरह से भाई लोगों को आमजन का समर्थन मिला. मी अन्ना हजारे के नारों से देश की गलियां गूंजी. जिस कदर देश के मीडिया ने तीन-चार महीनो तक भाई लोगों का गुणगान किया. टीम इंडिया से भी ज्यादा टीम अन्ना लोकप्रिय हुई.हवा में उड़ते और चने के झाड पर बैठे बुद्धिजीवी लोगों की टोली इस अकिंचन की बात क्यों सुनती. वैसे भी ज्ञानी लोग कह गए हैं कि जो चलती में ना चलावे, वो मुर्ख कहलावे. खैर जो हुआ सो हुआ. बीती ताहि बिसार दे, आगे कि सुधि ले. वैसे भ्रष्टाचार की इस जंग के असमय ही दम तोड़ जाने से देश के बहुसंख्य उन लोगों को पीड़ा तो अवश्य हुई होगी, जो भ्रष्टाचार से पीड़ित हैं और इससे चिंतित हैं. लेकिन नाहक चिंता करने से क्या होता है जी. चिंता के अलावा चिंतन भी बहुत जरूरी है. आओ नये साल में हम सब ये चिंतन करें कि क्यों ये मुहिम फेल हुई. क्यों रामलीला मैदान और एम्एम्आरडीए मैदान पीपल ऑफ़ इंडिया के आगमन के लिए तरसते रहे. आखिर ये लड़ाई थी तो हमारे लिए ही ना..आओ चिंतन करें.</h2>
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<p><strong>प्रवीन शर्मा</strong></p>
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		<title>लोकतंत्र में यह क्या हो रहा हे ?</title>
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		<pubDate>Thu, 29 Dec 2011 04:58:26 +0000</pubDate>
		<dc:creator>uday</dc:creator>
				<category><![CDATA[बोलता आईना]]></category>

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		<description><![CDATA[मेरा हर देशभक्त और देश प्रेमी से अनुरोध है कृपया 1 मिनट का समय देकर गौर से इसे पढ़ें. अगर आपको लगता है कि बात में सच्चाई है तो यह सन्देश दूसरों को भी फॉरवर्ड करें . अन्ना, स्वामी रामदेव और भाजपा नेतृत्व वाली NDA या अन्य जो भ्रष्टाचार के विरूद्ध लड रहे है उनसे [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>मेरा हर देशभक्त और देश प्रेमी से अनुरोध है कृपया 1 मिनट का समय देकर गौर से इसे पढ़ें. अगर आपको लगता है कि बात में सच्चाई है तो यह सन्देश दूसरों को भी फॉरवर्ड करें .<br />
अन्ना, स्वामी रामदेव और भाजपा नेतृत्व वाली NDA या अन्य जो भ्रष्टाचार के विरूद्ध लड रहे है उनसे कांग्रेस क्यों परेशान है, जानिए कारण……………..<br />
1) सरकार हर साल लोगों से 134 प्रकार के टैक्स से कितना पैसा जमा कराती है और ये पैसे कहा खर्च हो जाते है?<br />
…2)मंदिरों का पैसा सरकार किस मद में खर्च कराती है जिसे सिर्फ हिन्दू दान देकर इकठ्ठा करता है, ये बहुत बड़ा प्रश्न है.<br />
3) काले धन का इतिहास क्या है, पहले कपिल सिब्बल ने कहा कोई भी नुकसान २ जी घोटाले में नहीं हुआ है, फिर अहलुवालिया ने कहा की हा वास्तव में कोई घोटाला नहीं हुआ है, फिर मनमोहन ने कहा इसकी जाँच चल रही है, विपक्ष को टालते रहे, राजा जैसा आदमी जिसके पास अपनी मोबाइल को टाप अप करने का पैसा नहीं हो, यदि वह अपनी पत्नी के नाम 3000 करोड़ रुपया मारीशाश में जमा कर दे, क्या यह सब बिना सोनिया की जानकारी के कर सकता है, उस पार्टी में जहा पर बिना सोनिया के पूछे कोई वक्तव्य तथाकथित प्रवक्ता नहीं दे सकते है,<br />
4) फिर आया महा घोटाला देवास-इसरो डील का जिसमे की 205000 करोड़ की बैंड विड्थ को मात्र 1200 करोड़ के 10 साल के उधार के पैसे में दे दिया गया, भला हो सुब्रमनियम स्वामी जी का जिन्हें इन चोरो को नंगा कर दिया, हमारी कांग्रेसी और विदेशी मिडिया सुब्रमनियम स्वामी की तस्वीर हमेशा से गलत पेश किया है जब की वास्तव में भारत देश को ऐसे ही इमानदार नेताओ की जरुरत है जिसने कभी भी चोरी के बारे में सोचा ही नहीं,<br />
5) फिर आया कामनवेल्थ खेल का 90000 करोड़ का घोटाला, फिर कोयला का घोटाला जिसमे ठेकेदारों द्वारा 10 पैसे प्रति किलो के भाव से कोयला खरीदा जाता है और उसे बाजार में 4 रुपये किलो तक बेचा जाता है, यह रकम अब तक 26 लाख करोड़ होती है,<br />
6) इटली के 8 बैंक और स्वीटजरलैंड के 4 बैंको को 2005 में भारत में क्यों खोला गया है और इसमे किसका पैसा जमा होता है, ये बैंक किसको लोन देते है और इनका ब्याज क्या है, इनकी जरुरत क्यों आ पड़ी भारत में जब की भारत के ही बैंकरों की बैंक खोलने की अर्जियाँ सरकार के पास धूल खा रही है, इन बैंको को चोरी छुपे क्यों खोला गया है, इन बैंको आवश्यकता क्यों है जब भारत में 80% लोग 20 रूपया प्रतिदिन से भी कम कमाते है.<br />
7)भारत के किसानो से कमीशन लेने वाले चोर कत्रोची के बेटे को अंदमान दीप समूह में तेल की खुदाई का ठेका क्यों दिया गया 2005 में, किसने दिया ठेका, किसके कहने पर दिया ठेका, क्या वहा पर पहले से ही तेल के कुऊ का पता लगाकर वह स्थान इसे दे दिया गया जैसे की बहुत बार खबरों में अन्य संदर्भो में आती है, यह खबर क्यों छुपाई गयी अब तक, इसे देश को क्यों नहीं बताया गया, मिडिया क्यों इसे छुपा गई, और विपक्ष ने इसे मुद्दा क्यों नहीं बनाया.<br />
<img src="http://drsinwer.jagranjunction.com/wp-includes/images/smilies/icon_cool.gif" alt="8)" /> सरकार ने पहले कहा की बाबा बकवास कर रहे है, काला धन नाम की कोई चीज नहीं है, फिर खबर आयी की काला धन है और सबसे ज्यादा भारतीयों का है, यह स्विस बैंको के आलावा 70 और दुसरे देसों में जमा है,<br />
9) सरकार ने कहा की टैक्स चोरी का मामला है, हम उन देशो से समझौते कर रहे है, जिससे की दोहरा कर न देना पड़े, यह टैक्स चोरी नहीं भारत देशको लूट डालने का मामला है<br />
10) फिर बात आई की यदि ये भ्रष्टाचारी और लुटेरे इसमे से 15% टैक्स सरकार को दे तो इसे भारत के बैंको में जमा करने दिया जायेगा और किसी को यह हक़ नहीं होगा की वह पूछे की या इतना पैसा कैसे कमाया या लूटा. सरकार इस पर एक कानून क्यो नही ला रही है, किसको बचाया जा रहा है?<br />
11) यूरिया घोटाला है और यूरिया किसान को दुगुने दाम बेचा जाता है, फिर गेहू सस्ते में खरीदा जाता है, हम अभी तक सुरक्षित अन्न भण्डारण की व्यवस्था क्यों नहीं बना पाए जब की हमारे पास धन की कमी ही नहीं है, क्योकि अन्न को सडा दिखाकर उसे कौड़ियो के भाव शराब माफिया को बचा जाता है जब की गरीब अन्न बिना मर रहा है।<br />
12)हमारे देश में क्यों अनुसन्धान के लिए पर्याप्त पैसा नहीं दिया जाता है, यह कीसकी चाल है, जिसकी वजह से हम 5-10 गुना दाम में विदेशी चीजे खरीदते है, क्या कारण है की हमारे देश में एक भी सोलर ऊर्जा वैज्ञानिक नहीं है और दुनिया भर के परमाणु वैज्ञानिक है जो हमें हमेशा झूठा अश्वाव्हन देते है की यह परमाणु बिजली सस्ती और निरापद है भारत की परमाणु से सम्बंधित कुल बाजार 750 लाख करोड़ का होगा. जब की हम भारत में 400000 मेगावाट सोलर बिजली बना सकते है,<br />
13)ऐसे कौन से कारण है जिनके कारन हम नेहरू के द्वारा ट्रांसफर अफ पॉवर अग्रीमेंट 14 अगस्त 1947 को दस्तखत करने के बाद भी आज तक विक्सित नहीं बन पाए, जब की हमारी जनता हफ्ते में 90 घंटा काम करती है जबकि कामचोर अंग्रेज हफ्ते में सिर्फ 30 घंटा काम करते है,<br />
14)क्या कारण है की हमारे 5೦ रुपये में 1 डालर और 90 रुपये में 1 पौंड मिलाता है, जब की 1947 में 1 रुपये में 1 डालर मिलता था.<br />
15) मीडिया को निष्पक्ष बनाने के लिए सरकार क्या कदम उठा रही है, मिडिया , टीवी और पत्रिकाए सरकार को बिक जाती है और निराधार और झूठ को भी सच बताकर प्रस्तुत करती है।<br />
16) अगर देश में 2 लाख करोड़ रुपये की नकदी सर्कुलेशन में है तो देश की अर्थव्यवस्था करीब 100 लाख करोड़ रुपयों की होती है. और हमारे देश में रिजर्व बैंक अबतक लगभग 18 लाख करोड़ रुपयों के नोट छाप चुका है और कमसे कम 10 लाख करोड़ रुपये सर्कुलेशन में है. इस हिसाब से देश की अर्थव्यवस्था करीब 400 से 500 लाख करोड़ रुपये होनी चाहिए लेकिन अभी हमारी अर्थव्यवस्था केवल 60 लाख करोड़ की है. जबकि इतनी अर्थव्यवस्था के लिए दो लाख करोड़ से भी कम सर्कुलेशन मनी की जरूरत है.<br />
17) अगर 400 लाख करोड़ रूपये का काला धन देश में वापिस आ जाता है तो देश की अर्थव्यवस्था करीब 20,000 लाख करोड़ रुपये होगी … क्या आप जानते हैं कि इस समय अमेरिका सबसे शक्तिशाली देश है और उसकी अर्थव्यवस्था करीब 650 लाख करोड़ की है… मतलब 400 लाख करोड़ रुपये वापिस मिलने पर हम अमरीका से भी 30 गुना ज्यादा शक्तिशाली बन सकते है.</p>
<p>जय हिंद ,वन्दे मातरम ……………………………..</p>
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<p>&nbsp;</p>
<p><strong>डी. एन. सिनवर</strong></p>
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]]></content:encoded>
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		<title>सियासी घनचक्‍कर में लोकपाल</title>
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		<pubDate>Thu, 29 Dec 2011 04:46:30 +0000</pubDate>
		<dc:creator>uday</dc:creator>
				<category><![CDATA[Editorial]]></category>

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		<description><![CDATA[आ गया लोकपाल। पता नहीं, खुद कमजोर है या मजबूत। लेकिन सियासी दलों के मजबूत या कमजोर होने का पैमाना जरूर बन गया। जदयू के प्रधान शरद यादव ने मंगलवार को लोकपाल पर बहस के दौरान लोकसभा में कहा था-मजबूर कभी मजबूत फैसला नहीं ले सकता। यह बात कुछ घंटों बाद यानी आधी रात को [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<address>आ गया लोकपाल।<em> पता नहीं, खुद कमजोर है या मजबूत। लेकिन सियासी दलों के मजबूत या कमजोर होने का पैमाना जरूर बन गया। जदयू के प्रधान शरद यादव ने मंगलवार को लोकपाल पर बहस के दौरान लोकसभा में कहा था-मजबूर कभी मजबूत फैसला नहीं ले सकता। यह बात कुछ घंटों बाद यानी आधी रात को सौ फीसदी सच साबित हुई। लोकपाल को संवैधानिक दर्जा दिए जाने का संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में धड़ाम हो गया। यह किसी और का नहीं, कांग्रेस के सबसे मजबूत स्‍तंभ राहुल गांधी का सपना था। गेम चेंजिंग आइडिया था। अब सवाल उठता है ऐसा क्‍यों हुआ ? सीधा सा जवाब है-पक्ष में तो तिहाई बहुमत नहीं मिल पाया। फिर वही सवाल ऐसा क्‍यों हुआ, जब संप्रग सत्‍ता में है। यह जवाब भी सीधा सा है-सपा, बसपा और राजद के कारण। यह तीनों दल संविधान संशोधन विधेयक पर मतविभाजन के दौरान लोकसभा से बहिर्गमन कर गए थे। ऐसा क्‍यों हुआ? यह सवाल फिर जिन्‍न की तरह बोतल से बाहर है। लेकिन इसका जवाब सीधा सा नहीं, बल्कि घनचक्‍कर वाला है।</em></address>
<p><em>सियासी घनचक्‍कर वाला। कांग्रेसनीत संप्रग सरकार को समर्थन का दम भरते नहीं थकते सपा, बसपा और राजद। फिर मतविभाजन के दौरान दोनों लोकसभा से बाहर क्‍यों रहे। संविधान संशोधन के लिए मतविभाजन जरूरी होता है और आंकड़ा सरकार के पास नहीं था। क्‍या यह कांग्रेस नहीं जानती थी। जानती थी, तभी तो कांग्रेस के संकटमोचक प्रणब मुखर्जी का संशोधन विधेयक गिरने के तत्‍काल बाद कहना था-हमारे पास सामान्‍य बहुमत है, दो तिहाई नहीं। सरकार के लिए सामान्‍य बहुमत की जरूरत होती है। जाहिर है, हस्र से सब वाकिफ थे। फिर भी संविधान संशोधन विधेयक लाया गया। या तो प्रणब, चिदंबरम, कपिल सिब्‍बल और सलमान खुर्शीद जैसे विशेषज्ञों की गिनती कमजोर है। या फिर नतीजा जानते-बुझते हुए ऐसा किया गया। हो सकता है कि सपा और बसपा के प्रति आत्‍मविश्‍वास भी एक कारण रहा हो। लेकिन यह बात आम आदमी के गले उतरने वाली नहीं। क्‍या इस पर स्‍टैंडिंग कमेटी में सपा और बसपा से चर्चा नहीं हुई, विचार-विमर्श नहीं हुआ। इसका एक पहलू यह भी हो सकता है कि संप्रग और सपा-बसपा की सोची-समझी रणनीति के तहत सब हुआ हो। भाजपा को कठघरे में खड़ा करने के लिए। ताकि सशक्‍त लोकपाल की वकालत कर रही भाजपा के माथे पर ठीकरा फोड़ा जा सके। अन्‍ना आंदोलन के कारण जनमानस में लोकपाल को लेकर संप्रग सरकार के खिलाफ बनी हवा को निकाला जा सके। यह दलील दी जा सके कि हमने तो सांविधानिक दर्जा देकर लोकपाल को सशक्‍त बनाने की पुरजोर कोशिश की। लेकिन भाजपा ने ऐसा होने नहीं दिया। इसकी बानगी लोकसभा में विधेयक गिरने के तत्‍काल बाद देखने को मिली। ज‍ब प्रणब मुखर्जी ने भारतीय लोकतंत्र के लिए सबसे दुर्भाग्‍यपूर्ण दिन बताते हुए भाजपा को जिम्‍मेदार ठहराया। कपिल सिब्‍बल ने कहा कि भाजपा चाहती ही नहीं थी कि लोकपाल बिल पास हो। अगले दिन संप्रग अध्‍यक्ष सोनिया गांधी का भी कहना था-भाजपा का असली चेहरा कल सामने आ गया। स्‍थायी समिति में भाजपा ने चर्चा के दौरान वादा किया था कि लोकपाल को संवैधानिक दर्जे का वह समर्थन करेगी। लेकिन दगा किया। यह पार्टी भरोसे के लायक नहीं है। सोनियाजी के कहने का लबोलुआब यह था कि सशक्‍त लोकपाल के वजूद में न आने के लिए भाजपा जिम्‍मेदार है। खैर, कारण जो भी रहे हों, संविधान संशोधन विधेयक तो गिर ही गया। एक और सवाल-अब आगे क्‍या ? कहा तो यही जाता है कि पुत्र पिता के पदचिह्नों पर चलता है। उसके आदर्शों को आगे बढ़ता है। इस विधेयक के साथ ही वही हुआ जो कभी राजीव गांधी के सपने के साथ 22 साल पहले हुआ था। राजीव गांधी ने पंचायती राज संस्‍थाओं को संवैधानिक दर्जा दिलाने का सपना देखा था। वर्ष 1989 के दौरान इस संबंध में संविधान संशोधन विधेयक राज्‍यसभा में गिर गया था। प्रधानमंत्री ने नैतिकता की एक नजीर पेश की। विधेयक गिरने के बाद लोकसभा भंग की और चुनाव का सामना किया। यह दीगर बात थी कि चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। लेकिन राजीव गांधी का यह सपना पूरा हुआ, वर्ष 1991 में कांग्रेस जब फिर सत्‍ता में आई, पंचायती राज संस्‍थाओं को संवैधानिक दर्जा देने का विधेयक पास हुआ। क्‍या राहुल गांधी अपने पिता राजीव गांधी के आदर्शों को आगे बढ़ाएंगे, उनके जैसा नैतिक साहस दिखाएंगे ? इसका भी सीधा जवाब है-नहीं, नहीं और कतई नहीं। वजह यह कि राहुल में ऐसा नैतिक साहस ही नहीं है और ना कभी होगा।</em></p>
<p>&nbsp;</p>
<p>&nbsp;</p>
<p><strong>मदन मोहन सिंह </strong></p>
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		<title>चक्रव्यहू में अभिमन्यु</title>
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		<pubDate>Wed, 28 Dec 2011 05:05:38 +0000</pubDate>
		<dc:creator>uday</dc:creator>
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		<description><![CDATA[शायद स्वाधीन भारत के इतिहास का काला पन्ना साबित होने जा रहा है&#124; ४२ साल से लोकतंत्र में मक्कारी करने वाले, एक सच्चे भारतीय को जो एम् एम् आर डी ऐ मैदान में भूखा प्यासा और निमोनिया के कारण १०४ डिग्री तप रहे व्यक्ति को, राजीनीतिक कुचक्र से कुचलने जा रहे हैं &#124; जिसके लिए [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>शायद स्वाधीन भारत के इतिहास का काला पन्ना साबित होने जा रहा है| ४२ साल से लोकतंत्र में मक्कारी करने वाले, एक सच्चे भारतीय को जो एम् एम् आर डी ऐ मैदान में भूखा प्यासा और निमोनिया के कारण १०४ डिग्री तप रहे व्यक्ति को, राजीनीतिक कुचक्र से कुचलने जा रहे हैं | जिसके लिए यह व्यक्ति रोज़ अपनी जान लगा रहा है, यह शर्म की बात है कि यहाँ का अवाम सो रहा है | अन्ना को शायद यह ध्यान नहीं रहा होगा कि गाँधी को अंग्रेजों के सामने अनशन करना था जोकि आजके नेताओं से जिन्हें हम ही से चुनवा लिया जाता है, धोके से और दबंगई से, कही ज्यादा निक्रष्ट है | यही कहा जा सकता है कि इस समय यहाँ का युवा खून पानी हो गया वर्ना यूँ ही यह खून का घूंट न पी जाते | यह एक निर्णायक मोड़ भारत के सामने आ खड़ा हुआ चूँकि इस तरह का माहोल कई दशक में आया है जब भारतीय जनता किसी सर्वमान्य नेतृत्व को स्वीकार कर आगे बढ रहा था | इस आन्दोलन का राजनितिक कुचक्र में बिखर जाना अब इस बात को तय करेगा कि लम्बे समय के लिए हम उसी भ्रष्ट सिस्टम मेंरहने को तैयार रहे जिसे आज़ादी के बाद से भुगतते रहे है | राजनितिक जमात ने जो खेल तमाशा संसद और बैठकों में दिखाया उससे साफ़ है कि वे अपने खिलाफ ऐसा बिल कैसे ले आयें जिसके आती ही सारे सांसद और मंत्री जेलों में जाने को मजबूर हा जाएँ | लोगों कि बेशर्मी ही होगी कि वे अन्ना जोकि उनकी लड़ाई लड़ रहा है उसको जब नीचता कि हद पर चुके नेता गाली दे रहे हैं तो वे नै साल का जश्न मना रहे थे | मरे जमीरों के बीच अन्ना ने यह बड़ी भूल की वह यहाँ अलख जलने चले आये | जो समाज खुद इस समय घर में बैठकर अपने लिए दूसरों से लड़ने की आशा रख रहा उसकी आने वाली पीडिया इसे भुगतेंगी | यहाँ के नौनिहाल आजके युवा की तरह नौकरी न मिलने पर आत्म हत्या को मजबूर होगे | किसान अपने ही खेत पर कीटनाशक खाकर मर जायेगा | सरकारी पक्ष में नपुंसक नेताओं का काम वहां राजकुमार की हर भाव भंगिमा के अनुसार हाँ हजुरी में लग जाना राजनितिक धर्म है | आज की राजनितिक बिरादरी अपने को अभिजात्य मानती है उनका जनता को आदर करने कोई इरादा नहीं है | यहाँ सारे अधिकार नेताओं के हैं | एक चांटा यदि भ्रष्ट बहुदे नेता को पड़ जाये तो संसद से लेकर पूरे हिंदुस्तान में उसे लोकतंत्र पर हमला मान लिया जाता और भर्तसना पर भर्तसना शुरू हो जाती है | आम आदमी अपनी मांग लेकर जाती है तो नेताओं के गुंडे मार मार कर अधमरा कर देती है | राजनितिक गल्यारों में औरतों का इस्तेमाल चारे तरह हो रहा है और कितनी भंवरी जाने कहाँ किन परिस्थ्तिओं क़त्ल हो रही हैं | आम आदमी रोज़ उन लोगों की कबड्डी देखने को मजबूर हैं जो पैसे और बहुबल से पहले खुद को चुन्वाते हैं फिर अपनी हैसियत ओहदे को सविधान से जोड़कर आम जनता को हडकाते दिखाई देते हैं | किसी राजनितिक पार्टी को इस समय भ्रष्टाचार से लड़ने की नहीं अपनी अपनी चालों से सत्ता सुख भोगने की चाह है | जब अपने भत्ते बडवना अपनी तनख्वाह जिंदगी भर जनता की जेब डाका डालकर पेंसन की व्यवस्था करना तो गज़ब का भाईचारा सभी सांसद विधायक दिखाते हैं | चक्रव्यहू में फंसकर जन लोकपाल अभिमन्यु की तरह कल की सुबह नहीं देख पायेगा और सभी उस समय के धरतीपुत्र , गुरु द्रोण और आज के हम जैसे निष्क्रिय लोग खड़े खड़े तमाशा देखते रहेंगे |</strong></p>
<p>&nbsp;</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>&nbsp;</p>
<p><strong>राज</strong></p>
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		<title>किसानों को आत्‍महत्‍योपरांत सम्‍मानित किया जाए</title>
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		<pubDate>Wed, 28 Dec 2011 05:00:21 +0000</pubDate>
		<dc:creator>uday</dc:creator>
				<category><![CDATA[व्यंग]]></category>

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		<description><![CDATA[किसान परेशान होकर आत्‍महत्‍या कर रहा है। नेता बेईमान काले धन से लिपट रहा है। मेरा देश महान फिर भी महान है। किसान आत्‍महत्‍या कर रहे हैं, यह उनका दोष है। खेती करो, फिर खेती में नुकसान हो तो किसने कहा है कि आत्‍महत्‍या करो। जैसे खेती आपने किसी से पूछ कर नहीं की, वैसे [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>किसान परेशान होकर आत्‍महत्‍या कर रहा है। नेता बेईमान काले धन से लिपट रहा है। मेरा देश महान फिर भी महान है। किसान आत्‍महत्‍या कर रहे हैं, यह उनका दोष है। खेती करो, फिर खेती में नुकसान हो तो किसने कहा है कि आत्‍महत्‍या करो। जैसे खेती आपने किसी से पूछ कर नहीं की, वैसे ही आपको किसी ने आत्‍महत्‍या करने के लिए भी तो अनुरोध नहीं किया है। धंधा कोई भी हो उसमें नफा नुकसान तो चलता रहता है। किसानों के आत्‍महत्‍या करने से तो इस धारणा को बल मिलता है कि खेती करना इस देश में सबसे नुकसानदेह धंधा है बल्कि इसे धंधा मानकर तो किया ही नहीं जा सकता है। अगर खेती का धंधा नुकसानदेह होता तो भारत जो आज कृषिप्रधान होने से गौरवान्वित महसूस कर रहा है, वो न कर रहा होता। समय परिवर्तनशील है इसलिए कृषि में न सही, परंतु इससे जुड़े दलाली के धंधे में तो चमक आई ही है। वैसे भी संपूर्ण देश में आजकल दलालों का बोलबाला है। कोई भी क्षेत्र इससे बचा नहीं है इसलिए असल धंधेबाज तो आज दलाली में मशगूल रहते हैं और सबकी बत्‍ती गुल करते देते हैं। उनका कुछ इंवेस्‍ट नहीं होता फिर भी मोटी मलाई और चिकनाई उनके हिस्‍से में ही आती है और उनके ओठों पर अपनी ऊंगलियां फिराकर कभी भी जांच सकते हैं। आपकी ऊंगली न फिसल जाए तो कहना। इसमें न तो जोखिम होता है और न आय में ही कमी आती है। आता है सिर्फ धन ही धन। वही धन धन्‍नासेठ बनाता है, फिर चाहे उस धन से धान खरीदो अथवा उसी के बल पर वोट खरीदकर राजनीति में घुस जाओ और नोट ही बिछाओ, नोट ही खाओ और नोट ही लहराओ। यहां नोट से तात्‍पर्य करेंसी नोटों से है। किसी सरकारी बाबू की फाईल पर टिप्‍पणी से नहीं। क्‍योंकि अगर आपने विवेक से काम नहीं लिया और अपना और अपने जानवरों का पेट भरने के जुगाड़ में खेती में सुनहरा भविष्‍य जानकर किस्‍मत आजमाई तो इस बात की पूरी गारंटी है कि इसकी परिणति आत्‍महत्‍या में ही होगी।</p>
<p>वैसे भी समझदार सरकार की समझ में यह नहीं आ पा रहा है कि अगर कोई किसान आत्‍महत्‍या करता है तो इसके लिए सरकार जिम्‍मेदार कैसे हो जाती है। जैसे सड़क पर वाहनों के जलने की घटनाओं के लिए सरकार की जिम्‍मेदारी नहीं बनती है, उसी प्रकार किसानों के आत्‍महत्‍या करने की जिम्‍मेदारी सरकार की तो कतई नहीं हो सकती। किसी को किसी के चांटा मारने की जिम्‍मेदारी भी सरकार नहीं लेती है। इसी प्रकार जूते-चप्‍पलों के मरने-मारने की जिम्‍मेदारी सरकार लेने लगी तो सरकार तो मर ही जाएगी। सरकार तो सोते हुए नागरिकों पर डंडे चलवाकर भी जिम्‍मेदारी लेने से किनारा कर लेती है। फिर इस प्रकार की आत्‍महत्‍याओं से तो सरकार का न सीधा और न टेढ़ा ही संबंध है, इसलिए इसकी जिम्‍मेदारी सरकार पर डालना, सरकार के साथ घोर अत्‍याचार है।</p>
<p>सरकार आखिर सरकार है, कोई अभियुक्‍त या आम नागरिक नहीं है कि जिसे पकड़ा और ठूंस दिया जेल में और उस पर मड़ दिया आरोप। इसे ही कहा जाता है पुलिसिया प्रकोप। यह किसी पर भी किसी भी समय बरस सकता है बेमौसम की बारिश की मानिंद।</p>
<p>अब अगर किसानों को मरने में ही आनंद मिल रहा है तो सरकार उनके आनंद लेने के उपक्रम में आड़े कैसे आ सकती है। अधिक समझदार नागरिक मेट्रो के आगे मरने के लिए कूद जाते हैं, उसके लिए जिम्‍मेदार भी मेट्रो को बतलाते हैं। मेट्रो सरकारी मशीनरी है इसलिए जिम्‍मेदार सरकार हो गई। जबकि प्रबुद्ध समुदाय का यह मानना है कि आत्‍महत्‍या करना बढ़ती आबादी स�� निजात पाना ही है और इससे सरकार के द्रुत विकास में योगदान देना ही साबित होता है। जितनी आबादी कम होगी, देश का उतनी तेजी से विकास होगा, इस सच को मानने से भला किसे इंकार होगा। सरकार तो आत्‍महत्‍या कर चुके किसानों को मरणोपरांत सम्‍मानित करने की योजना भी लागू करने वाली है जिससे इस प्रकार के देश विकास के कार्यों को अन्‍य क्षेत्रों में भी भरपूर प्रोत्‍साहन मिल सके। जब एक किसान आत्‍महत्‍या करता है तो वह अकेला नहीं मरता, अपने पूरे परिवार को साथ लेकर मरता है। इससे उसके देशप्रेम के पारिवारिक जज्‍बे के बारे में मालूम चलता है। आखिर अकेला मरकर वह सरकार का कितना धन बचा पाता, इसलिए अंत समय में शर्मिन्‍दा होने से बचने के लिए वह संपूर्ण योगदान करता है।</p>
<p>सिर्फ मीडिया ही इस प्रकार के कार्यों को सही प्रकार से पेश नहीं कर रहा है जिससे इस प्रकार की गतिविधियों से नकारात्‍मक संदेश समाज में जा रहा है। आप उस समाचार में छिपे शुभ विकास संदेश को ग्रहण कीजिए। किसान शब्‍द का शाब्दिक अर्थ तो आन (प्रतिष्‍ठा) के लिए किस (चुंबन) करना है। किस के प्रयोग से आपके मन में डर्टी पिक्‍चर का ख्‍याल तो नहीं कुलांचे मारने लगा। भला मिट्टी लपेटकर डर्टीत्‍व को प्राप्‍त हुआ किसान मिट्टी के सिवाय किस को किस करने की कोशिश कर सकता है, अब वह किसी आइटम गर्ल को किस करने की तो सोचने से रहा। आखिर वह भूमिपुत्र है। उसका प्रत्‍येक किस धरती मां के लिए है। अगर कोई पुत्र अपनी मां को किस कर रहा है तो इसमें गलत क्‍या है। इससे चाहे उसके मुंह में मिट्टी ही क्‍यों न भर जाए ?</p>
<p>आप अपनी भावनाओं को दूषित होने से बचाइये। किसान के आत्‍महत्‍या के योगदान को स्‍वीकारिए, सराहिये। जिससे सचमुच देश का चहुंमुखी विकास हो रहा है। इसे चाहे आप आज नहीं स्‍वीकार रहे हैं, परंतु कल अवश्‍य स्‍वीकारेंगे और इसमें कोई अड़चन आड़े नहीं आएगी।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>&nbsp;</p>
<p><strong>अविनाश</strong></p>
<p>&nbsp;</p>
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		<title>सज़ा ए मौत : न सज़ा , न मौत</title>
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		<pubDate>Tue, 27 Dec 2011 05:27:59 +0000</pubDate>
		<dc:creator>uday</dc:creator>
				<category><![CDATA[बोलता आईना]]></category>

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		<description><![CDATA[अभी हाल ही में आए कुछ अहम फ़ैसलों में अपराधियों को मौत की सज़ा सुनाई गई । इससे पहले भी मौत की सज़ा मिले आरोपियों , जिनमें अजमल और अफ़ज़ल जैसे आतंकवादी भी हैं को फ़ांसी दिए जाने में हो रही देर ने फ़ांसी की सज़ा अर पुन: बहस छेड दी । इस बीच सर्वोच्च [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>अभी हाल ही में आए कुछ अहम फ़ैसलों में अपराधियों को मौत की सज़ा सुनाई गई । इससे पहले भी मौत की सज़ा मिले आरोपियों , जिनमें अजमल और अफ़ज़ल जैसे आतंकवादी भी हैं को फ़ांसी दिए जाने में हो रही देर ने फ़ांसी की सज़ा अर पुन: बहस छेड दी । इस बीच सर्वोच्च न्यायालय के एक न्यायमूर्ति का विचार इस सज़ा को मानवीयता के विरूद्ध मानने जैसा आया जिसने इस बहस को एक न्यायमूर्ति का विचार इस सज़ा को मानवीयता के विरूद्ध मानने जैसा आया जिसने इस बहस को एक नई दिशा दे दी ।</p>
<p>ऐसा नहीं है कि फ़ांसी की सज़ा पर पहले बहस-विमर्श नहीं हुआ है । अभी कुछ वर्षों पहले जब धनंज़य चटर्ज़ी नामक एक अपराधी , जिसने एक नाबालिग बच्ची का बलात्कार करने के बाद उसकी हत्या कर दी थी की सज़ा पर बोलते हुए तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ ए पी जे अब्दुल कलाम ने अपना विचार देते हुए कहा था कि फ़ांसी की सज़ा सिर्फ़ गरीबों को ही न मिले क्योंकि बडे और रसूखदार अपराधी कानून के शिकंज़े से बच निकलते हैं । उनके इस वक्त्यव्य के बाद एक्नई बहस की शुरूआत हो गई थी कि क्य अगरीब और अमीर के लिए कानून की परिभाषा अलग अलग है ।</p>
<p>इससे अलग अभी हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय के एक न्यायमूर्ति महोदय ने कैपिटल पनिश्मेंट यानि मौत की सज़ा अक पहुंचने से पहले के विधिक मानक यानि ” रेयरेस्ट ऑफ़ द रेयर की परिभाषा को सर्वथा अस्पष्ट करार देते हुए इसे दुरूस्त करने की वकालत की । उन्होनें एक विधि विशेषज्ञ के रूप में अपनी बात रखते हुए कहा किमौजूदा कानून में दुर्लभतम में से दुर्लभ ” अपराध मानए व समझने के लिए कोई स्पष्ट दिशा निर्देश नहीं है इसलिए ये पूर्णतया उस न्यायाधीश के विवेक पर निरभर करता है । यही वजह है किकभी कभी निचली अदालतों द्वारा दी गई अधिकतम सज़ा को ऊपरी अदालतों ने बिल्कुल उलट दिया है ।</p>
<p>विश्व के अन्य प्रमुख देशों में भी मौत की सज़ा को लेकर सवर्था भिन्न भिन्न मत हैं । मानवाधिकारों कीवकालत और मानव जीवन की संरक्षा करने वाले देशों ने मौत की सज़ा को न सिर्फ़ अमानवीय करार दिया हुआ है बल्कि इसे पूरे अंतरराष्ट्रीय कानूनों से हटाने केल इए भी बाकायदा मुहिम छेड रखी है । यदि इतिहास को खंगाला जाए तो अब से लगभग ढाई हज़ार वर्ष पहले फ़ांसी की सज़ा को ईरान में अपनाए जाने के साक्ष्य मिलते हैं वो भी पुरूष अपराधियों के लिए । उन्नीसवीं शताब्दी के अंत तक जब तक कि मौत की सज़ा के लिए ज़हर का इंजेक्शन या ऐसी ही किसी अन्य वैकल्पिक प्रणाली प्रचलन में नहीं आई थी , फ़ांसी की सज़ा ही मुख्य तरीके के रूप में अपनाई जाती रही । आज भी मिस्र , भारत ,पाकिस्तान , मलेशिया , सिंगापुर तथा अमरीका के कुछ राज्यों में यह प्रचलित है .</p>
<p>संसद पर हमले की दसवीं बरसी पर अफ़ज़ल गुरू की फ़ांसी की सज़ा के क्रियान्वयन में हो रही देरी ने पुन: इस्मुद्दे की ओर ध्यान खींचा है कि किसी अपराधी को मौइत की सज़ा सुनाए जाने और उसे इस सज़ा को दिए जाने के लिए क्या कोई समय सीमा तय होनी चाहिए । धनंजय चटर्ज़ी को सज़ा सुनाए जाने के लगभग डेढ दशक बाद उसे फ़ांसी पर लटकाए जाने के समय भी यही बात प्रमुखता से उछली थी । भारत की बहुस्तरीय न्यायिक व्यवस्था में अंतिम फ़ैसला आने में पहले ही बहुत अधिक विलंब होता है जबकि मौत की सज़ा पाए अपराधियों की अपील का निपटारा वरीयता के आधार पर पहले किया जाता है । अंतिम अदालती फ़ैसले केपश्चात भी मुजरिम के पास राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिका दाखिल करने का अधिकार होता है और यहीं से विधिक प्रक्रिया सियासी दांव पेंच में उलझ कर रह जाती है । न तो इन दया याचिकाओं के निपटारे की कोई समय सीमा निर्धारित होती है और न ही इन्हें लेकर कोई मापदंड या दिशानिर्देश तय है ।</p>
<p>इसका परिणाम ये होता है कि जेलों में उच्च सुविधा पाए ये अपराधी गुनाहगार होते हुए भी राजकीय मेहमानों सी सुख सुविधा का लाभ उठाते रहते हैं । सालों साल लटकता इनके सज़ा का क्रियान्वयन जहां एक तरफ़ सरकार व शासन पर भारी आर्थिक बोझ डालता है वहीं दूसरी तरफ़ सेनाव अन्य सुरक्षा बलों के मनोबल को भी बुरी तरह गिरा देता है । अफ़ज़ल गुरू व अज़मल कसाब जैसे दुर्दांत आतंकियों के मामलों में तो ये संभावना भी काफ़ी प्रवल रहती है कि इन्हें जेलों से छुडाने के लिए या बदलालेने के लिए इनके साथी इससे ज्यादा बडी आतंकी घटनाओं को अंज़ाम दें ।</p>
<p>वर्तमान परिप्रेक्ष्य में सरकार व प्रशासन को इस मुद्दे पर दो बातों के लिए अपना रूख बिल्कुल स्पष्ट कर देना चाहिए । पहली बात ये किक्या मौजूदा कानूनी व्यवस्था में मौत की सज़ा देने न देने पर किसी तरह की बहस विमर्श की गुंजाईश है । यदि नहीं तो किस कारण से राज्य की विधानसभाएं अदालतों द्वारा दोषी करार दिए जाने और फ़ांसी की सज़ा सुनाए जाने के बाद उन अपराधियों को माफ़ किए जाने की मांग उठाती हैं । यदि उन मुज़रिमों कोमाफ़ी दिए जाने या न दिए जाने का अधिकार किसी को है तो वो हैं पीडित और उनका परिवार ।</p>
<p>दूसर अहम मुदा है फ़ांसी की सज़ा सुनाने से लेकर फ़ांसी की सज़ा दिए जाने के बीच के समय कोतय किया जाना । आज लगभग सौ अपराधी देश की भिन्न भिन्न अदालतों में मौत की सज़ा सुनाए जाने के बाद मौत की सज़ा कोपाने की प्रतीक्षा में हैं । सरकार प्रशासन व नीति निउअम तय करने वाली संस्थाओं को अविलंब ही इस दिशा में ठोस निर्णय लेना होगा अन्यथा पहले ही सज़ा का खौफ़ खत्म हो चुके अपराधियों के लिए ये बडी सहज़ सी स्थिति होगी और कानून ,न्यायपालिका ,सेना , पुलिस व सुरक्षा बलों के लिए विकट । फ़िलहाल तो पूरा देश अफ़ज़ल व अज़मल कोदेश के प्रति किए गए आपराधिक दु: साहस का दंड दिए जाने के लिए सरकार की ओर देख रहा है ।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>&nbsp;</p>
<p><strong>अजय झा</strong></p>
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		<title>आदमी और मुर्गा</title>
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		<pubDate>Tue, 27 Dec 2011 05:08:33 +0000</pubDate>
		<dc:creator>uday</dc:creator>
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		<description><![CDATA[आदमी, मुर्गा को मुर्गा बनाने में कामयाब हुआ है। अभी तक आदमी ही मुर्गा बनता था। मेरी राय में यह आदमी की बहुत बड़ी उपलब्धि है। मैं तो यूरेका-यूरेका चिल्ला रहा हूं। आदमी होने के नाते आप भी ऐसा कर सकते हैं। आदमी ने आदमी के मार्केट में मुर्गा के दो नये ब्रांड लांच किये [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>आदमी, मुर्गा को मुर्गा बनाने में कामयाब हुआ है। अभी तक आदमी ही मुर्गा बनता था। मेरी राय में यह आदमी की बहुत बड़ी उपलब्धि है। मैं तो यूरेका-यूरेका चिल्ला रहा हूं। आदमी होने के नाते आप भी ऐसा कर सकते हैं।<br />
आदमी ने आदमी के मार्केट में मुर्गा के दो नये ब्रांड लांच किये हैं। दो तरह का मुर्गा। यह नया मुर्गा है। स्वास्थ्य मुर्गा है। आदमी, आदमी की सेहत के लिए मुर्गे की सेहत का पूरा ख्याल रख रहा है। सिवान से रिपोर्ट आयी है कि कड़ाके की ठंड से मुर्गे- मुर्गियों के बच्चों को बचाने के लिए उनको दारू पिलायी जा रही है। आदमी, इतना उदार कभी नहीं था। भई, मैं तो आदमी की आदमीयत पर फिदा हो गया हूं।<br />
अभी तक यह बात सामने नहीं आयी है कि दारू पीकर बड़े हुए मुर्गे के कटने के समय कैसा सीन बनता है? मुर्गा, क्या एक्ट करता है? कैसा फील करता है? उसके संगी-साथी, नाते-रिश्तेदारों का क्या री-एक्शन होता है? यह सब कुछ दिन बाद संभव है। अभी तो चूजे जवान हो रहे हैं। मस्ती में हैं। आदमी को थैंक्स दे रहे हैं। आदमी के बारे में अपनी धारणा बदल रहे हैं। चूजों को अपने बाप- दादों के इस बात पर भरोसा कम रहा है कि वे तो कटने के लिए ही धरती पर आते हैं।<br />
ऐसी ढेर सारी बातें हैं। इन पर मजे का शोध हो सकता है। मेरी गारंटी है मजा आ जायेगा। खैर, यह सब जब होगा तब होगा। आदमी ने अभी से यह जरूर स्पष्ट कर लिया है कि दारू पीकर जवान हुए इन मुर्गों को खाते वक्त दारू की जरूरत शायद ही पड़ेगी। बस ये वाला मुर्गा खाइये, दारू की मस्ती अंडरस्टूड है। यह बोनस में होगी। मुर्गा, चाहे वह फ्राई हो-दो प्याजा हो-बिरियानी हो, बोनलेस हो, चिल्ली हो, करी हो …, साथ-साथ होगी।<br />
यह मुर्गा ढेर सारी धारणा को शर्तिया बदलेगा। अमूमन शराब के शौकीन अपनी मस्ती के दौरान मुर्गा का इस्तेमाल शराब के साथ करते हैं। मगर मुर्गा के इस नये ब्रांड में उसके चखना होने का सिचुएशन बिल्कुल गोल हो जायेगा।<br />
आदमी और मुर्गा का संबंध बड़ा पुराना है। मानव सभ्यता के विकास के साथ-साथ मुर्गा, गाय-कुत्ता-बकरी जैसे घरेलू जानवरों की श्रेणी में बखूबी शुमार हुआ है। आदमी, मुर्गा को बेस कर के ढेर सारी कहावतें बनाये रहा है-मुर्गा बनना, मुर्गा चाभना, मुर्गा फंसना …! ये सारी कहावतें आदमी ने आदमी के लिए बनायी हुईं हैं।<br />
लेकिन अब जाकर आदमी, मुर्गा को मुर्गा बना पाया है। अभी तक आदमी, मुर्गा बनता रहा है। आदमी के मुर्गा बनने में मेरा व्यक्तिगत अनुभव बड़ा पुराना है। अक्सर गणित की कक्षा में मेरा मुर्गा भाव खुलेआम होता रहा। लेकिन मुर्गा कभी आदमी नहीं बनता है। वह खुद को मेनटेन रखे हुए है। मुर्गा और आदमी में बड़ा फर्क है। मुर्गा, आदमी के लिए कुर्बान हो जाता है। कभी-कहीं आदमी का मुर्गा के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने का संदर्भ नहीं मिलता है।<br />
आदमी ने कोलस्ट्राल फ्री मुर्गा भी बनाया है। यह मुर्गा का लेटेस्ट ब्रांड है। इसकी ढेर सारी खासियत है। आदमी पर इसके यूज का असर बाद में पता चलेगा। हां, एक बात अभी से तय है कि इस ब्रांड के मुर्गे को कभी हार्ट अटैक नहीं होगा। वह बिल्कुल कोलेस्ट्राल फ्री है। चलिये, आदमी बर्ड फ्लू का इलाज नहीं तलाश पाया, तो कम से उसे दिल की बीमारी से तो निजात दिला ही दी है। यह भी आदमी की मुर्गे के प्रति आदमीयत का चरम है। वाकई, आदमी बड़ा महान होता है। बड़ा उदार होता है।<br />
दिल की बीमारी वाला आदमी बेधड़क कोलस्ट्रोल फ्री मुर्गा को चाभ सकता है। और अगर कोलस्ट्रोल फ्री प्रजाति वाले चूजे को दारू पिलाकर डेवलप किया जाये तो …! यह उन लोगों के लिए नया व लजीज प्रोडक्ट होगा, जिनको डाक्टर ने दारू की दुकान की तरफ देखने को भी मना किया हुआ है।<br />
आदमी इधर मुर्गे पर ढेर सारा काम कर रहा है। बढिय़ा है। होना चाहिये। इस ब्रांड के ढेर सारे बाई प्रोडक्ट्स हो सकते हैं। हम इसे अंडा से भी जोड़ सकते हैं। आगे के दिनों में यह प्रोडक्ट आजमाया जा सकता-हर्बल मुर्गा। यह मुर्गा का लेटेस्ट वर्जन हो सकता है। मुर्गा को एलोबेरा खिलाकर बड़ा हुआ बताया जा सकता है। इसे आदमी की शाकाहारी जमात यूज कर सकता है।<br />
यह आदमी के लिए भड़कने वाली बात नहीं है। मैंने सावन में शिवभक्तों को देखा है। मुर्गे, उनके बोलबम से वापस लौटने का इंतजार करते रहते हैं।<br />
मुर्गे के इस आविष्कार में एक नेताजी ने अपना संस्मरण जोड़ा है। संदर्भ, दारू पीने वाले चूजों का है। उन्होंने कहा है-बिल्कुल सही बात है। ठंड में दारू का असर फूल-पत्तियों पर भी होता है। … मेरे यहां कुछ लोग जुटे थे। मूड में आने के बाद दो-तीन जनों को ठंड में ठिठुरते फूल के पौधों की फिक्र हुई। उन्होंने कुछ बूंदें उन पर टपका दीं। दो दिन बाद देखा कि ये पौधे अपने साथियों की तुलना में ज्यादा लहलहाये हुए हैं। बड़े-बड़े फूल खिले हैं। शोध की एक लाइन यह भी है। बाप रे, आदमी जो न करे। और क्यों न करे! उसके पास दिल है। हाथ है, जीभ है, पेट है। और ये दिल मांगे मोर …!</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>&nbsp;</p>
<p><strong>फंटूस(जागरण)</strong></p>
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		<title>गरीबी जाति नहीं देखती जनाब</title>
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		<pubDate>Mon, 26 Dec 2011 06:31:43 +0000</pubDate>
		<dc:creator>uday</dc:creator>
				<category><![CDATA[बोलता आईना]]></category>

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		<description><![CDATA[भारत में जाति का क्या स्थान है इससे आप भी भली-भांति परिचित होंगे.हमारे कुछ पढ़े-लिखे मित्र भी जाति नाम परमेश्वर में विश्वास रखते हैं.हमारे एक पत्रकार मित्र जो यादव जाति से आते हैं किसी से परिचित होने पर सबसे पहले उसकी जाति पूछते हैं.एक बार उन्होंने पटना से मुजफ्फरपुर तक पदयात्रा की योजना बनाई.तब मुझसे [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>भारत में जाति का क्या स्थान है इससे आप भी भली-भांति परिचित होंगे.हमारे कुछ पढ़े-लिखे मित्र भी जाति नाम परमेश्वर में विश्वास रखते हैं.हमारे एक पत्रकार मित्र जो यादव जाति से आते हैं किसी से परिचित होने पर सबसे पहले उसकी जाति पूछते हैं.एक बार उन्होंने पटना से मुजफ्फरपुर तक पदयात्रा की योजना बनाई.तब मुझसे पूछा कि हाजीपुर से मुजफ्फरपुर के बीच सड़क किनारे यादवों के कितने गाँव हैं और तब मैं उनकी जातिभक्ति से हतप्रभ रह गया.यही वे लोग होते हैं जो सड़क पर पड़े घायल की तब तक मदद नहीं करते जब तक उन्हें इस बात की तसल्ली न हो जाए कि दम तोड़ रहा व्यक्ति उनकी ही जाति से है.<br />
मित्रों,जहाँ तक मेरा मानना है कि व्यक्ति की जाति सिर्फ तभी देखनी चाहिए जब बेटे-बेटी की शादी करनी हो वरना २४ घंटे,सोते-जागते,उठते-बैठते जाति के बारे में सोंचना अमानवीय तो है ही मूर्खतापूर्ण भी है.ये तो हो गई आम जनता की बात लेकिन हम उनका क्या करें जो विभिन्न जातियों और धर्मों के बीच तनाव की ही खाते हैं.आपने एकदम ठीक समझा है मैं बात कर रहा हूँ उन नेताओं की जो गरीब और गरीब तथा वंचित और वंचित और इस तरह इन्सान और इन्सान के बीच में फर्क करते हैं.<br />
दोस्तों,गरीबी,जहालत और बेबसी ये ऐसे शह हैं जो कभी जाति-जाति और धर्म-धर्म के बीच भेदभाव नहीं करते.ये तो उतनी ही संजीदगी के साथ सवर्ण हिन्दुओं पर भी नमूदार हो जाते हैं जितनी संजीदगी के साथ अन्य जाति और धर्मवालों पर.फिर अगर हम गरीबों के बीच जाति और धर्म के नाम पर सुविधाएँ और आरक्षण देने में भादभाव करते हैं तो हमसे बड़ा काईयाँ और कोई हो ही नहीं सकता.<br />
मित्रों,अभी कुछ ही दिनों पहले देश के अग्रणी दलित उद्यमियों ने एक मेले का आयोजन किया शायद मुम्बई में.वहां उन्होंने बताया कि वे लोग अपनी फर्मों और कारखानों में ५०% सीटें दलितों के लिए आरक्षित रखते हैं और बाँकी ५०% अन्य सारी बड़ी-छोटी जातियों के लिए;आखिर गरीबी तो उनमें भी है न.क्या हमारी सरकार और हमारे राजनेताओं को भी इन दलित उद्यमियों से शिक्षा लेने की आवश्यकता नहीं है?ये दलित उद्यमी कोई रामविलास पासवान के परिवार से नहीं हैं और न हो चांदी का चम्मच मुंह में लेकर पैदा हुए हैं.इन्होंने गरीबी में जन्म लिया और गरीबी में ही पले-बढ़े.फिर अपनी बुद्धि और बाहुबल से गरीबी से लड़कर उसे पराजित किया और आज सफलता के शिखर पर जा पहुंचे हैं.लेकिन ये लोग नहीं भूले हैं गरीबी के दर्द को जो अपने आपमें सबसे बड़ी बीमारी है.अगर हम इनकी तुलना गरीबी से उठकर आए राजनेताओं से करें तो सिवाय निराशा के कुछ भी हाथ नहीं आएगा.लालू-रामविलास-मुलायम-मायावती जैसे बहुत-से राजनेता हैं जो वास्तव में गुदड़ी के लाल हैं लेकिन सफलता पाते ही,अमीर बनते ही ये अपने गरीबी धर्म को भूल गए और जाति-धर्म की राजनीति में खोकर रह गए.<br />
मित्रों,गरीब सिर्फ गरीब होता है;उसकी कोई जाति नहीं होती.अभाव उसका भाई होता है,दुःख उसका पिता और जहालत उसकी माँ.बेबसी और भूख ही उसके भाई-बन्धु होते हैं.मैंने अपने गाँव में कई ऐसे राजपूत-ब्राह्मण देखे हैं जिनके पास पहनने के लिए ढंग का कपड़ा तक नहीं है.जाकर उनकी मजबूरी से पूछिए कि उसकी क्या जाति है?जाकर उनके परिजनों के फटे पांवों और खाली पेटों से पूछिए कि उसका मजहब क्या है?यक़ीनन वो राजपूत-ब्राह्मण-यादव-दलित या मुसलमान नहीं बताएँगे बल्कि अपनी जाति और धर्म दोनों का नाम सिर्फ और सिर्फ गरीबी बताएँगे.मैंने अगर दलितों के घर में गरीबी के कारण भैस बेचने पर लोगों को मातम मनाते देखा है तो मैंने बड़ी जातिवालों के घर में भी बेटी की शादी में इकलौता बैल बेचने के बाद दो-दो दिनों तक चूल्हे को ठंडा रहते हुए भी देखा है.क्या इन दोनों परिवारों की मजबूरी की,उनके आंसुओं की कोई जाति है?क्या इन दोनों घरों में पसरे मातमी सन्नाटे का कोई मजहब है?खुद मेरे चचेरे चाचा को लम्बे समय तक अपनी माँ के पेटीकोट को लुंगी बनाकर पहनना पड़ा और पढ़ाई भी बीच में ही छोडनी पड़ी.क्या मेरे उन चाचा की दीनता और हीनता को किसी खास जाति या धर्म की दीनता या हीनता का नाम देना अनुचित नहीं होगा?मेरे उन्हीं चाचा की पत्नी और बच्चों के कपड़ों पर लगे पैबन्दों की क्या कोई जाति हो सकती या कोई मजहब हो सकता है?पहले भले ही विभिन्न जातियों में गरीबी का अनुपात काफी अलग रहा हो अब लम्बे समय से चले आ रहे जाति-धर्म आधारित आरक्षण के बाद स्थिति बहुत ज्यादा अलग नहीं रह गयी है.इस बात का गवाह सिर्फ एक मैं ही नहीं हूँ बल्कि सरकारी अमलों द्वारा निर्मित गरीबी रेखा से नीचे जीवन जीनेवालों की सूची भी चीख-चीखकर यही कह रही है कि गरीबों की और गरीबी की कोई जाति नहीं होती,कोई धर्म नहीं होता.<br />
दोस्तों,अंत में मैं सत्ता पक्ष और विपक्ष के सभी नेताओं से विनम्र निवेदन करता हूँ कि वे कृपया इंसानियत को जातियों और धर्मों में विभाजित न करें.जब गरीबी ने कभी इंसानों और इंसानों के बीच अंतर नहीं किया तो वे कौन होते हैं ऐसा करनेवाले?गरीबी अपने-आपमें ही बहुत बड़ा ईश्वरीय मजाक होती है इसलिए कृपया वे इस क्रूर मजाक का और भी मजाक नहीं बनाएँ.आरक्षण देना हो या कोई और सुविधा देनी हो दीजिए,शौक से दीजिए परन्तु सुविधा दीजिए सिर्फ गरीबी देखकर,गरीबों की पहचान करके;न कि उसकी जाति और धर्म देखकर क्योंकि इस तरह तो बहुत-से ऐसे लोग सुख की उस रौशनी और अवसर से वंचित रह जाएँगे जिन पर उनका भी वास्तविक हक़ है और फिर पीढ़ी-दर-पीढ़ी गरीबी उनके लिए घर में जबरदस्ती घुस आए मेहमान की तरह अड्डा जमा लेगी.</p>
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<p><strong>बृज किशोर</strong></p>
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		<title>लंगोटी संभाल नेता ….खुलती चली जाय रे !!!</title>
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		<pubDate>Mon, 26 Dec 2011 06:19:56 +0000</pubDate>
		<dc:creator>uday</dc:creator>
				<category><![CDATA[व्यंग]]></category>

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		<description><![CDATA[आदरणीय मित्रों,बहनों एवं गुरुजनों ,..सादर प्रणाम ,…आजकल जिसे देखो वही चिंतित है ,..आम आदमी की चिंता को गोली मारो ,..अब तो बेचारे नेता मंत्री भी परेशान हैं,..तो आपकी सेवा में प्रस्तुत है नेताओं की दर्द भरी दास्ताँ … ……………………………………………………………………. चौधरी लोटा सिंह और टेनी प्रसाद वर्मा पुराने मित्र हैं ,… कभी प्रदेश में कठोर सिंह [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>आदरणीय मित्रों,बहनों एवं गुरुजनों ,..सादर प्रणाम ,…आजकल जिसे देखो वही चिंतित है ,..आम आदमी की चिंता को गोली मारो ,..अब तो बेचारे नेता मंत्री भी परेशान हैं,..तो आपकी सेवा में प्रस्तुत है नेताओं की दर्द भरी दास्ताँ …<br />
…………………………………………………………………….<br />
चौधरी लोटा सिंह और टेनी प्रसाद वर्मा पुराने मित्र हैं ,… कभी प्रदेश में कठोर सिंह की सरकार में दोनों का दबदबा था,..क्या जमाने थे ?….बस यूं समझ लीजिये कि मलाई के अक्षय ढेर पर कब्ज़ा था जितना हाजमा था उससे कई गुना ज्यादा ही हजम किया होगा ,…फिर समय बदला ……लोटा सिंह अपनी फितरत के हिसाब से थाली बदलते रहे ,..जिस थाली में ज्यादा माल देखा उसी से चिपकते गए,…..टेनी प्रसाद ने कुछ समय कठोर सिंह के साथ ही बिताया ,…फिर सोचा होगा कि बिना मलाई के खाने से क्या फायदा ,. तो उन्होंने देश को मलाई के साथ हजम करने की क्षमता रखने वाली शाही दवाखाने की राजमाता के चरणों में अपना सबकुछ अर्पित कर दिया ,…राजमाता बड़ी दयालु हैं ,.. जो भक्त उनको अपना सबकुछ सौंप देता है उसे अभय के साथ मलाईदार गद्दी मिलती ही है ,………………&#8230;उधर लोटा सिंह आजकल मलाई से दूर थे,…जब मलाई थी तब उनको देखकर लोटने वाले चमचे भी अब उनको खाली हाथ देखकर कन्नी काटने लगे ,…..अंततः चौधरी साहब ने भी राजमाता के चरणों में गिरने में ही भलाई समझी ,…तुरंत आशीर्वाद मिला ,..हवाई किले बनाने वाले लोटा सिंह को हवाई गद्दी दी गयी ,……एक दिन मौका पाकर लोटा सिंह ने टेनी को अपनी गुप्त निजी पार्टी में आमंत्रित किया ,…..पुरानी पार्टिओं के जलवे अभी टेनी प्रसाद के मन में जवान ही थे ,..सोचा आगे पता नहीं कब मौका नसीब हो ,…ससुरे आंदोलनों और चुनाव की मगजमारी में अब मौज कहाँ?…. किसी तरह से “खाओ और पचाओ” का कार्यक्रम ही हो पाता है,….एक रात मजे ले ही लेते हैं ….,…….दिखावटी ना नुकर के बाद टेनी ने “ख़ास इंतजाम” की हिदायत के साथ हामी भरी…<br />
……………………………………………<br />
दिल्ली से डेढ़ दो घंटे दूर नेताजी के फार्महाउस पर व्यवस्था हुई ,….यहाँ के कर्ता-धर्ता मुरारी लाल हैं ,..सारी व्यवस्था उनकी देखरेख में ही होती है ,..जैसा नेता जी और उनकी औलादें कहें वैसा इंतजाम करना उनका धर्म है ,… मालिक के नमक का कर्जा उतारते है,..साथ में मोटी भीख भी मिलती है ….मौज की तो पूछो ही मत !,…………………………………………एक मेजबान और एक ही मेहमान के लिए अच्छा-ख़ासा इंतजाम है ,.रसोइओं की टीम तरह तरह के पकवान बना रही है ,..फैट फ्री मटन से लेकर सुगर फ्री मीठे तक सबकुछ तैयार है ,…..विदेशी बार बालाएं अदाओं के साथ ऐसे बोतलों से खेल रही हैं जैसे वो इनके ब्वायफ्रेंड हों,……………………………नेता जी लोग पधार चुके हैं ,…मुरारी लाल ने उनको कमरे तक पहुँचाया शाबासी मिलने की आस में इंतजाम का ब्यौरा भी दिया ,….लेकिन यह क्या ,..टेनी बाबू उखड गए ,.<br />
” मैंने कहा था की मेरा इंतजाम देसी रखना ,..क्यों नहीं किया ?..”<br />
” क्या बात करते हैं सर!…आजकल तो विदेशी माल की ही डिमांड है….देसी को कौन पूछता है ,.और उसमें खतरा भी बहुत है ,..पता नहीं कब कौन भंवरी देवी बन जाये,. आप भी बुढ़ापे में जेल की चक्की !!….” मुरारी ने जानबूझकर अपने शब्द रोक लिए.<br />
टेनी बाबू मुरारी के तर्क से लाजबाब हो गए,.पीठ पर हाथ रखते बोले ,…..” चलो ठीक है,..जाओ कुछ जल्दी भेजो,.. गला सूख रहा है यार “<br />
मुरारी गोली की तरह कमरे से बाहर निकल गया ,…दोनों मित्रों ने आपस में आँखों के माध्यम से इंतजाम पर ख़ुशी व्यक्त की …<br />
” टेनी बाबू एक बात बताओ ,.मैं दरबारी तो बन गया ,.लेकिन यह दरबार चलेगा कितने दिन ?..बड़ी चिंता होती है भाई ,..”………लोटा सिंह से रहा नहीं गया .<br />
” तुम बहुत हलके आदमी हो ,तभी इधर उधर उड़ते रहते हो ,.. परेशान क्यों होते हैं ,..अपनी महरानी बहुत शातिर हैं ,..कम से कम चालीस पचास लोमडिया पक्का मरी होंगी जब ये पैदा हुई होगी,….बिलकुल चिंता ना करो,. मस्त होकर मंत्रालय उडाओ ,..ये सोचो की जल्दी से जल्दी कितना माल बनाओगे”…………..टेनी बाबु ने लोटा सिंह का हौसला बढाया .<br />
” माल तो बनता ही रहेगा ,..पहले वाले से चार गुना नहीं बनाया तो मेरा नाम भी लोटा सिंह नहीं”………….लोटा सिंह ने सीना फुलाते हुए कहा .<br />
तब तक दो सुन्दर बालाएं जाम लिए अदा से मुस्कराते हुए हाजिर हुई,………..दोनों अनुभवी निगाहों से उनके भूगोल का अध्ययन करते हुए सुरा चढाने लगे ………..स्वर्णजडित पात्र खाली कर मुस्कराते हुए बालाओं को पकडाया ,….लोटा सिंह तो जैसे नशीली आँखों में डूब ही गए ,..पुछा …”क्या नाम है तुम्हारा “…<br />
” सॉरी……….” ….कह बाला इठलाती हुई बाहर निकल गयी ..<br />
लोटा सिंह एक झटके के साथ टेनी बाबू को देखने लगे ,..फिर बोले ,..” तुम जो मर्जी कहो ,..लेकिन मुझे लगता है की अन्ना के अन्दर फौजी देशभक्ति जाग गयी है ,.हमको बर्बाद कर ही देगा ,…अब पीछे नहीं हटेगा !!”.<br />
” क्यों सब बेमजा करते हो ,..यही बात करनी थी तो बुलाया क्यों ?….एक तो अन्ना जपते जपते नींद ही नहीं आती है ,.. आ भी जाये तो सपने में भी वही आता है ,..अब यहाँ तुम भी !!…”.. टेनी बाबू ने खीजकर कहा ,..<br />
” अच्छा छोड़ो अन्ना को ,.ये बताओ जो बिल मैडम ने बनवाया है उसमें तो हम नहीं फसेंगे ?..”…….लोटा सिंह ने अगला सवाल दागा ..<br />
” हा हा हा …… बेवक़ूफ़ समझते हो क्या ?…हम फंसे तो देर सबेर शाही खानदान भी फंसेगा ,…………..बिलकुल जलेबी की तरह बनवाया है ,..जनम बीत जायेगा लेकिन कोई माई का लाल हमारा गला नहीं पकड़ सकता ,..अरे ये बिल पहले कानून होता तो अपने जो संगी साथी तिहाड़ में ऐश कर रहे हैं वो आज अपने साथ मजे लूट रहे होते!.” टेनी बाबू की बात से लोटा सिंह चकित हो गए और बोले<br />
” वो कैसे “<br />
” अरे भाई,.. अपने भाई बंधु ही लोकपाल बनते ,..थोडा खाते जरूर लेकिन काम नहीं रुकता ,..और ये होता तो अदालत क्यों बिना मतलब टांग फसाती ,..सी बी आई तो है ही सरकारी रखैल ,..अब समझे की नहीं ..”…टेनी ने फिरसे अपने तर्कों से लोटा सिंह को लाजबाब कर दिया ….तब तक जाम और विशेष पकवान लिए बालाएं फिरसे हाजिर हुई ..<br />
तहजीब के साथ पीते हुए लोटा सिंह ने इसबार बाला से अंग्रेजी में पुछा ……..” डू यू लाईक इंडियन “…<br />
” या ..वेरी मच ,…दे आर वेरी नाईस पर्सन्स “…..बाला ने पूरी अदाएं बिखेरते हुए कहा ..<br />
” हू इज यौर फेवरेट इंडियन …” …… टेनी बाबू ने बाला को धीरे से छूते हुए पूछा .<br />
” या ..आना हजारे इज माय ..”<br />
” तेरी (बीप बीप बीप ) …!!….. मुरारी!!… स्साले किसको बुला लिया !!..भाग साली यहाँ से !…… मनोरंजन करने आई है या हमारी अर्थी उठाने!!…”&#8230;टेनी बाबू का गुस्सा बेकाबू हो गया ,..झुककर हांफने लगे ,…लोटा सिंह ने टेनी बाबू को पकड़ा ,…..बालाएं घबराकर रफ्फूचक्कर हो गयी ,…मुरारी दौड़ता हुआ आया ,…. लोटा सिंह ने आँख मारकर उसे भी बाहर रहने को कहा ,…..कुछ देर बाद थोडा संयत होने पर टेनी सोफे पर पसर गए ,……लोटा सिंह ने बाहर आकर खुद पैग बनाये ,..फिर अन्दर ले गए ,……..टेनी बाबू ने नजर उठाकर देखा फिर बोले ,…..” इतने से क्या होगा !!…बोतल यहीं ले आओ …लगता है अब यही सहारा होगी ..”..<br />
लोटा सिंह अवाक रह गए,. जिसको वो मजबूत समझते थे वो तो बिलकुल खोखला निकला ,..बोतल लाये …….मुरारी ने डरते हुए मांसाहार परोसा ……काफी देर तक दोनों पीते रहे ,..बीच में ज्यादा बातचीत नहीं हुई ….फिर लोटा सिंह बोले ,….” टेनी बाबू …मुझे लगता है की सच में मैंने गलती कर दी दरबार में शामिल होकर ,….लेकिन कोई और रास्ता भी तो नहीं है हमारे पास ..”..<br />
” देखो भाई ,…सच कहूं तो हमारी ग्रह दशा सब बिगड़ी लगती है ,…पता नहीं भगवान् हमसे क्यों रूठ गए ? ,..मजे से सब चल रहा था ,..सालों से मस्त होकर खा रहे थे कभी डकार भी नहीं निकाली … सोचा था इसबार बड़ी गद्दी मिलेगी ,….उल्टा अब जूते खाने की नौबत आ गयी है ,…रानी का आदेश मानना पड़ता है ,…उनकी इच्छानुसार गरियाना पड़ता है,……शाही खानदान का क्या है ,.योगी बाबा को पीट-पाट कर उनको लगता है की वो बच गए हैं ,…अन्ना की टीम में अपने आदमी भी लगाये लेकिन सबकुछ उल्टा होता ही दिख रहा है ,…फिर भी अभी हम हिम्मत नहीं हारेंगे ,……शैतान खोपड़ी वाले मां बेटे कोई न कोई जुगाड़ लगा लेंगे ,……आरक्षण का चारा फेंक दिया है ,..चिंडिया जरूर फसेंगी! ,…हमें बस किसी तरह खड़े रहना होगा ,……सेवा करेंगे तो पूरा मेवा मिलेगा,… है कि नहीं ….” टेनी बाबू ने अपने दर्द के साथ आशा भी व्यक्त की …लोटा सिंह ने भी सहमती जताई ,. थोड़ी देर बाद टेनी बाबू ने चले जाने की इच्छा जताई ,….लोटा सिंह ने कहा, “मैं रुककर क्या करूंगा ?” ,…..ड्राइवर और अंगरक्षक तैयार ही थे …..<br />
बाहर निकलते ही चौधरी के सामने नत्थूलाल खड़ा हो गया ,..नत्थूलाल यहाँ का पुराना और भरोसेमंद रक्षक है ,….चौधरी लोटा सिंह थोडा अचकचाए और कहा ” …बोलो नत्थू !!..”<br />
“साहब हमको छुट्टी चाहिए….”..नत्थू बेख़ौफ़ बोला .<br />
“तो हम क्या करें ,..मुरारी से कहो ” लोटा सिंह ने कड़ी आवाज में कहा ..<br />
” मुरारी जैसे टटपुन्जिये से क्या होगा ,..खुद तुम्हारे डर से भाग गया है…कहके गया है कि अनशन करके जेल जायेगा कुछ पाप कम होंगे उसके ,…सब एकदूसरे की गुलामी करके लूटते-खाते रहते हो ,.कहते हो कि आजाद मुल्क है …मैं नहीं काम करूंगा यहाँ,.. गार्डी ही करनी है,. कहीं भी कर लूँगा ,….थोडा देश की गार्डी भी करनी चाहिए ,.तनखाह दे सको तो दे दो नहीं तो ,..”…नत्थूलाल की बात पूरी होने से पहले ही लोटा सिंह आगे बढ़ गए ..दोनों एक गाड़ी में बैठ गए लेकिन एक दूसरे को देखने की हिम्मत नहीं जुटा सके<br />
…………..नत्थूलाल फिर बोला ,… “सच तो तो यह है नेता जी कि तुम सब पूरी तरह से डर गए हो ,….बस अहंकार में चूर हो ,…. अब तो लंगोटी ही बची है वो भी खुलती जा रही है ,..अगर संभाल सकते हैं तो सोचियेगा जरूर .”..</strong>..</p>
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<p><strong>संतोष कुमार</strong></p>
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