हम उस देश के वासी हैं, जहाँ रेल धकाधक चलती है।
कोई बिजली से चलती है, कोई डीज़ल से चलती है।।
कोई डब्बे के अन्दर है, कोई डब्बे से लटके हैं।
कोई डब्बे के ऊपर हैं, खा रहे हवा के झटके हैं।।
कोइ टिकट खरीद के चलता है, कोई बिना टिकट ही जाता है।
भारतीय ट्रेन से हे मित्रो, इन सब का गहरा नाता है।।
ये सब लालू की गाड़ी हैं, जो बिन चारे के चलती हैं।
कोई पीती हैं डीज़ल औ कोई बिजली से चलती हैं।।
सब तलबगार लालू के हैं, जिनके घर सारा चारा है,
जिस पर लालू की कृपा न हो, वह हो जाता बेचारा है।।
बिजली की गाड़ी एक जा रही थी, बिहार से हो करके।
खींची ज़ंजीर किसी जन ने, रुक गई ट्रेन धीमी होके।।
रुक गई ट्रेन फिर चल न सकी, लोगों ने पूछा यह कैसे।
बिजली ही नहीं तार में जब, तब गाड़ी मित्र चले कैसे।।
तारों में इन बिजली के प्रिय, होते हैं कुछ स्थल ऐसे।
जिनमें पावर के बिना ट्रेन, चलती जाती मोमेंटम से।।
देखो ड्राइवर की सूझ, दाद उसकी अवश्य देना मित्रो।
वह बोला लोगों से तुरंत, धक्का दो गाड़ी को मित्रो।।
देखो जनता की शक्ति प्रबल, धकेला गाड़ी को पथ पर मित्रो।
आधे घंटे के अंदर ही, गतिमान हुई गाड़ी मित्रो।।
यह कथा पढ़ी जब हमने सच, रोमांच हुआ तन में यारो।
देशी जुगाड़ टेक्नोलाजी का, प्रामिस ग्रेट सही यारो।।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...२४ मई २००७
Read original BBC story here बीबीसी पर प्रकाशित मूल समाचार जो कविता के लिए प्रेरणा स्रोत बना