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विश्व भोजपुरी सम्मॅलन से
अश्लीलता की बात नजरों का फेर
Sunday, 07-October-2007 | 06:21
भोजपुरी की लोक परंपरा पर भले ही अपसंस्कृति और अश्लीलता का शिकार होने का लांछन लगाया जाता हो लेकिन वास्तविकता इससे परे है। भोजपुरी में जिन लोगों को अश्लीलता नजर आती है वह उनकी नजरों और विचारों का फेर है। दरअसल भोजपुरी में जितना रस है उतना दुनिया की किसी दूसरी बोली में नहीं है। यह दीगर बात है कि सस्ती लोकप्रियता और पैसा कमाने के चक्कर में भोजपुरी के गीत गाने वाले और इससे जुड़ी फिल्मों में काम करने वाले इस बोली को बदनाम करने पर उतारू हैं।
उक्त विचार शनिवार को काशी हिंदू विश्वविद्यालय के स्वतंत्रता भवन में विश्व भोजपुरी सम्मेलन के राष्ट्रीय अधिवेशन के अंतिम दिन की बतकही में वक्ताओं ने व्यक्त किए। मुख्य अतिथि डॉ. राजेंद्र प्रसाद पाण्डेय ने कहा कि बच्चों को यदि हम भोजपुरी की संस्कृति से ठीक तरह से अवगत कराएंगे तो यह बोली कहीं से भी अपसंस्कृति की शिकार नहीं होगी। मुख्य वक्ता डॉ. राजेश्वर आचार्य ने कहा कि भोजपुरी में गंदगी नहीं है। भोजपुरी नई ऊर्जा का संचार करती है। वास्तव में यह बोली दाल में तड़के की तरह है जो हमारी माटी से हमें जोड़े रखती है। इसे संजोकर रखने की जरूरत है।
बतकही के इस सत्र में ओमान के मो. इशाद अहमद सहित सत्यप्रकाश, मनोज भावुक, श्रीकांत तिवारी, नीलिमा, श्यामलेंदु आदि ने विचार व्यक्त किए। इस सत्र का संचालन डॉ. प्रेम कुमार पाण्डेय ने किया।
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